संजय कुमार /
घरेलू गौरैया (पासर डोमेस्टिकस) एक पक्षी है जो यूरोप और एशिया में सामान्य रूप से हर जगह पाया जाता है। इंसानों का घर इनका बसेरा हुआ करता है लेकिन कंक्रीट के जंगलों ने इनके लिए इंसानों के घरों में आवासीय संकट पैदा कर दिया है। आवासीय खोज में यह पलायन कर जा रही है। गाँव में भी तेजी से बनते कंक्रीट के मकानों
ने गौरैया से उनका बसेरा छीन लिया है कई गांवो से गौरैया के गायब होने का एक कारण यह भी माना जाता है।

इतिहास गवाह है कि भी पूरे विश्व में जहाँ-जहाँ मनुष्य गया वहां वहां गौरैया भी गयी। शहरी इलाकों में गौरैया की छह तरह ही प्रजातियां पाई जाती हैं। हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो। इंसान जहाँ जहाँ गया देर सबेर गौरैया के जोड़े वहाँ रहने पहुँच ही जाते हैं।
इंसान के घर में ही ये अपना घोंसला बनाते है। खासकर अंडे देने के लिए घोंसला बनाने के लिए इंसान के घर या जहाँ इंसान रहता है आस पास घोंसला बनाते है। इस लिए इसे घरेलू गौरैया कहा जाता है। घोंसला बनाने के मामले में गौरैया बया पक्षी से कमजोर है। बया का घोंसला अद्भूत रहता है वहीं गौरैया जैसे तैसे घोंसला बनाती है। जब अंडे देने का समय आता है गौरैया इंसान के घरों में घोंसला बनाने जुट जाती है। जगह मुआइना करने के बाद ही यह घोंसला बनाती है। ज्यादातर खोह या वैसी जगह पर घोंसला बनाती है जहाँ कौआ जैसे हमलावर पक्षी की पहुंच नहीं हो।

इंसान के घर इसके लिए बेहतर होता है। इंसान भी अपने घरों में गौरैया के आने और घोंसला बनाने को शुभ मानता है। गौरैया इंसान के घर के अंदर प्रवेश कर वेंटीलेशन, पंखा में लगे कैप, बाथरूम का पाइप, घोंसला या खोह में यह घास-फूस को ला कर रख देती है। जो काफी हल्के और मुलायम होते है। गांव में फूस का घर इनका बेहतर जगह है। खपरैल का घर इनके रहने के लिए बहुत सुरक्षित होता है क्योंकि इसमें बडे हमलावर पक्षी का खतरा नहीं होता है।
शहर में ये दूकानों के शटर के उपर और खिड़की में लगे एसी के नीचे घोंसला बना कर अंडे देती है।पिछले कुछ सालों में शहरों में गौरैया की कम होती संख्या पर चिन्ता प्रकट की जा रही है। आधुनिक होते जीवन और बहुमंजिली इमारतों में गौरैया को रहने के लिए पुराने घरों की तरह जगह नहीं मिल पाती है। तो वहीँ सुपर मार्केट संस्कृति के कारण पुरानी पंसारी की दूकानें घटती जा रही हैं। इससे गौरेया को दाना नहीं मिल पाता है। शहरों में वेंटीलेशन या आवासीय कमी की वजह से गौरैया संरक्षण में लगे लोग लोगों को बाॅक्स लगाने की सलाह देते हैं।
बाॅक्स में भी गौरैया आती है और घोंसला बनाती है। गौरैया के घोंसला में कोई तकनीक नहीं रहता है। बस सुरक्षित जगह देख यह घास-फूस लाकर रख घोंसला बना लेती है। घोंसला बन जाने के बाद उसमें अंडे देती है।
बच्चे के निकलने और उसके उड़ने तक गौरैया जोड़ा एक एक कर घोंसला के पास हमेशा रहते है। एक बार जब बच्चे निकल जाये तो दूबारा अंडे देेने के लिए घोंसला के उपर फिर से घास-फूस डाल कर घोंसला को ठीक ठाक कर नया बना देते है। गौरैया के अलावे इंडियन राॅबिन, मैना को भी ऐसे करते हुए देखा है। (अनुभव के आधार पर) ।
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